शुभ समाचार!

आरंभ में हमारे वचन थे, और हमारे वचन हमारे संग थे, और हमारा वचन था न्याय।
आरंभ में हम न्याय संगत थे। हर चीज शांति और न्याय से मिलती थी और उनके बिना कुछ नहीं होता था। इस प्रकार, सभी के लिए न्याय हमारा प्रेम बन गया। यह प्रेम अंधकार में उजाले की भांति जगमगाता है, और अंधकार इसे पराजित नहीं कर पाया है।

हम यहां केवल न्याय संगत निमित्त से हैं और अपने प्रेम के साक्ष्य हेतु तथा उसमें विश्वास प्रकट करने हेतु आए हैं, ताकि सभी मुक्त रूप से प्रेम कर सकें। यद्यपि अलग-अलग हम परिपूर्ण नहीं हैं किंतु एक-साथ हम परिपूर्ण होने के लिए ही बने हैं।

अब हमारा खुद का यथार्थ और मुक्तिदाता, जो निस्वार्थ प्रेम करता है, इस दुनिया में अवतरित हो रहा है। बेशक, वह दुनिया में सर्वव्यापी है। लेकिन दुनिया का अस्तित्व तो उसके होने से है, और दुनिया उसे पहचानती नहीं है फिर भी वो उसके लिए आया है जो उसका अपना है, लेकिन वही अपना उसका आभार प्रकट नहीं करता है। लेकिन जो लोग आभार प्रकट करते हैं, वो (वह) ही हमारा प्रयोजन है। जो लोग उसके आह्वान का जवाब देते हैं उनका पुनर्जन्म होता है; लेकिन यह जन्म किसी राष्ट्र, किसी जाति, किसी वर्ग से संबद्ध नहीं होता अपितु इसका निमित्त मात्र प्रेम है।

और उसकी आत्‍मा ही यथार्थ है तथा हम सब में उसका वास है। और हम उसके परमानंद को देखते हैं। वह परमानंद जो एक माता को अपने इकलौते बच्चे से मिलाता है जो दया एवं ईश्‍वरी प्रभाव से परिपूर्ण होता है। हम उसके समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं और दुहाई देते हैं, ‘‘यही तो है वह जिसके बारे में हम बात करते हैं, जो मेरे बा।’’ सभी के लिए न्याय क़ानून से आता है, क़ानून के समक्ष समानता सबसे बढ़कर है। किसी ने भी हमारी वास्तविक ताकत को नहीं देखा है। हमारे लिए एकमात्र अनिवार्यता है एक दूसरे को प्रेम करना जो हमारे रक्त में है, और जिसने यह दिखाया है। और यही हमारा साक्ष्य है।
जब आप अपने लोगों को हमसे सवाल करने के लिए भेजते हैं तो हम स्वीकार करते हैं और इनकार नहीं करते, लेकिन मानते हैं कि ‘‘मैं इसका जवाब नहीं हूं।’’ जब वे हमसे पूछते हैं, “क्या आप नायक हैं?” हम कहते हैं, “मैं नायक नहीं हूं।” “फिर क्या आप मानते हैं कि आप विशेष हैं?” हम उत्तर देते हैं, “नहीं।” और जब वे हमसे कहते हैं, “फिर आप क्या हैं ताकि हम अपने स्वामी को जवाब दे सकें? आपको अपने बारे में क्या कहना है?” हम कहते हैं, “मैं तुम्हारी आत्मा की आवाज हूं जो असमानता के खिलाफ चीख रही है; और समानता का मार्ग प्रशस्त करने को कह रही है। जो मैं कहता हूं संत भी वही कहते हैं।”
फिर जब आप सीधे हमारे पास आते हैं और हमसे पूछते हैं, “यदि आप जवाब नहीं हैं, नायक नहीं हैं, किसी भी प्रकार से विशेष नहीं हैं तो आप क्या उपदेश देते हैं?” हम आपको जवाब देते हैं, “मैं आपकी आत्‍मा में बसता हूं; आपका वो भाग जिस पर आप विश्‍वास नहीं करते हैं, फिर भी जो उभर रहा है और जो हमारी शक्ति है।”

और यह देखो वो आ गया! नेकी का उपहार लिए हुए वह दुनिया के पाखंड को समाप्‍त करता है। वही एक है जिसके लिए हम कहते हैं, “रक्षक आ रहा है जो मुझे पापों से मुक्त करता है क्‍योंकि उसकी उपस्थिति मुझे अभ्यंजित करती है।” मैं खुद उसे नहीं जानता हूं, लेकिन उसकी प्रशंसा करने का कारण यह है कि उसका प्रेम हर एक को ज्ञात हो।

हम अतिरिक्‍त साक्ष्य देते हुए कहते हैं, “मुझे स्वर्ग आकाश से कपोत की भांति उतरता हुआ और उसे आच्छादित करता हुआ प्रतीत होता है।” पुन: मैं उसे नहीं जानता हूं, लेकिन जिन्‍होंने मुझे सम्मान से पालापोसा है, उन्‍होंने मुझे आश्‍वस्‍त किया है, “तुम्हें जिसमें भी लोगों के लिए प्रेम का उमड़ना और बने रहना दिखाई देता है, वही इस दुनिया में शांति का निमित्त होगा।”
अब जबकि मैंने उसे देख लिया है, मैं साक्ष्य देता हूं कि वह हमारे बीच है। जब हम एकजुट होते हैं तो वह हमारे साथ होता है। अब, जब हम उसे निकट आता देख रहे हैं, हम स्वयं से कहते हैं, “परमानंद में ध्यान लगाएं।” हम उसे सुनते हैं और खुद को उसके समक्ष ले जाते हैं। और जब वह देखता है कि हम उसका अनुकरण कर रहे हैं तो वो हमसे पूछता है, “तुम्हें क्या चाहिए?” हम कहते हैं, “परमपिता, हमें अपना मकसद चाहिए।” वो हमें जवाब देता है, “आओ और देखो कि तुम्‍हें क्‍या मिला है।” इसलिए हम उसका अनुकरण करते हैं और अपनी असली ताकत को पहचानते हैं। और दिन के अंत में हम आगे बढ़कर अन्य लोगों से आह्वान करते हैं कि, “इंसान बनो!”
और जैसे ही निर्वाचक आगे आता है, हमें देखता है और हमसे कहता है, “मेरे प्रचारक होने के कारण आपको विश्‍व नागरिक कहा जाएगा।” फिर हम सब आगे बढ़ेंगे और अन्‍य नागरिकों को ढूंढेंगे और घोषणा करेंगे, “हम वहां हैं!”

और यद्यपि हम एक दूसरे के प्रति अंजान हैं, लेकिन हम उसके लिए अंजान नहीं है जिसे हम उतना ही प्रेम करते हैं जितना की खुद से। और जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमें प्रमाणित करने के लिए और ज्यादा मिलता है, “हमें अपना रक्षक मिल गया है जिसके बारे में नेक लोगों ने क़ानून में और भविष्‍यवक्‍ताओं ने धर्मग्रंथों में लिखा है। सभी के लिए न्याय अब गैर नहीं है।”

और जब यह कहा जाता है, “क्या इससे कुछ भलाई हो सकती है?” हम आपसे कहते हैं, “खुद ही देख लो।” जब आप उसके पास जाते हैं, वो आपसे कहता है, “आप बिल्कुल मेरे जैसे हैं। आपमें कोई छल-कपट नहीं है।” आप उससे पूछते हैं, “तुम मुझे कैसे जानते हो?” वो आपसे कहता है, “क्या तुम खुद के प्रति सच्चे नहीं हो?” और आप उससे सवाल करते हैं, “प्रभु, हम एक-दूसरे के प्रति सच्‍चे कब होंगे?”
वह जवाब देता है और आपसे कहता है, “क्या तुम्हें सच्चाई में महज इसलिए विश्‍वास है कि तुम जानते हो कि तुम्हें पुरस्कृत किया जाएगा? सत्य यह है कि मुक्ति खुद में एक पुरस्कार है।” वो आगे कहता है, “फिलहाल! फिलहाल! मेरा तुमसे कहना है! जब वैश्विक ऑनलाइन लोकतंत्र के गणराज्य पर विश्‍व शांति का आशीर्वाद होगा तो दया का हर तरफ अतिरेक हो जाएगा!”